Mr. Writer & Madam Mysterious: Part - 6 (Love Story )

 Welcome to my story blog!

This is the beginning of an original Hindi love story, titled:

Mr. Writer &  Madam Mysterious(मिस्टर राइटर और मैडम मिस्टीरियस )

Told in weekly parts, this story explores quiet heartbreak, unspoken love, and the kind of connection that lingers even after it’s gone.

If you’ve ever loved deeply — or lost without closure — I hope this story finds you.

You can read Part Fivr here: Part 5

This is Part Six. Thank you for reading, and feel free to share your thoughts in the comments.

मिस्टर राइटर और मैडम मिस्टीरियस

भाग 6 : मैडम मिस्टीरियस का मुंबई आगमन

दो साल बीतने को आ गए थे...

आज 19 दिसंबर 2024 था। रात का सन्नाटा धीरे-धीरे गहराता जा रहा था और दीपक अपने कमरे में मेज पर झुका किसी नई कहानी के पन्ने भर रहा था।

दीपक की कहानियाँ कुछ ऐसी थीं कि पढ़ने वाला उन्हें केवल पढ़ता नहीं था, बल्कि महसूस करता था। ऐसा लगता था मानो वह शब्द नहीं लिखता, बल्कि अपने मन की भावनाओं को कागज पर उतार देता हो।

यह वह समय था जब लोगों के हाथों में किताबों की जगह मोबाइल आने लगे थे। छोटी-छोटी reels और shorts को ही बहुत लोग प्रतिभा का प्रमाण समझने लगे थे। मगर दीपक अब भी अपनी कलम पर विश्वास करता था। उसकी लेखनी में एक ऐसा अपनापन था जो सीधे पाठकों के हृदय तक पहुँच जाता था।

और उन पाठकों में एक नाम ऐसा भी था, जिसका हर छोटा-सा शब्द दीपक के लिए बहुत बड़ा अर्थ रखता था—अंबिका।

अंबिका दिनभर अपनी पढ़ाई में लगी रहती और रात को कुछ समय निकालकर दीपक की नई कहानी पढ़ती। फिर उसके नीचे कोई छोटा-सा प्यारा comment छोड़ देती।

बस... वही कुछ शब्द दीपक की रात बदल देने के लिए काफी होते।

कभी वह comment को दो-तीन बार पढ़ता, कभी मुस्कुराता और कभी जाने क्यों उसके मन में एक बेचैनी-सी उठती—

“आखिर कब मिलेगी वह लड़की, जिसके कुछ शब्द मेरी पूरी रात रोशन कर देते हैं?”



दीपक के जीवन में लड़कियों की कमी नहीं थी। परिचय थे, बातचीत थी, दोस्तियाँ भी थीं। मगर अंबिका के लिए उसके मन में जो स्थान था, वह किसी और के लिए नहीं था।

जिस लड़की को उसने केवल एक बार देखा था, उसकी एक झलक के सहारे उसने दो साल अपने खयालों में गुजार दिए थे।

शायद प्रेम का आरंभ यही होता है—जब कोई व्यक्ति आपके सामने न होकर भी आपकी जिंदगी का सबसे उपस्थित हिस्सा बन जाए।

उधर अंबिका की डिग्री की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी। अब वह आगे Master’s करना चाहती थी।

उसके पिता चाहते थे कि उनकी बेटी खूब पढ़े, आगे बढ़े और अपने परिवार का नाम रोशन करे। उन्हें विश्वास था कि घर की बड़ी बेटी यदि अपने पैरों पर खड़ी हो जाए, तो केवल उसका नहीं, पूरे परिवार का भविष्य बदल सकता है।

एक दिन उन्होंने अंबिका से कहा—

“बेटा, मुंबई जाकर अपनी आगे की पढ़ाई पूरी कर लो। वहाँ नानी का घर है। तुम्हें रहने की कोई परेशानी नहीं होगी।”



अंबिका ने यह सुनते ही मुँह बना लिया।

“मुंबई? दो साल के लिए?”

फिर कुछ पल रुककर बोली—

“नहीं पिताजी... यहीं देखिए न कोई कॉलेज। मैं आपको और माँ को छोड़कर इतनी दूर नहीं जाना चाहती।”

माता-पिता से दो दिन दूर रहने पर ही जिसका मन बेचैन हो जाता था, उसके लिए दो साल का विचार ही भयावह था।

मगर पिता भी अपने निर्णय पर अडिग थे।

उन्होंने बहुत समझाया। बेटी के भविष्य की बातें कीं। आखिरकार अंबिका मान गई।

पिता ने एक agent से बात करके मुंबई की टिकट निकलवा दी।

और टिकट भी दो दिन बाद की!

अंबिका को इस बात पर थोड़ी नाराजगी हुई।

“इतनी भी क्या जल्दी थी पिताजी... कुछ दिन बाद की टिकट निकलवाते। कम-से-कम कुछ दिन और आपके साथ रह लेती।”

लेकिन पिता जानते थे कि बेटी को विदा करना जितना कठिन है, उससे कहीं अधिक कठिन है उसके सपनों को रोक देना।




24 दिसंबर 2024

शाम के लगभग 7 बजकर 26 मिनट पर अंबिका ने मुंबई जाने वाली ट्रेन पकड़ ली।

उसे स्टेशन तक छोड़ने उसके पिता स्वयं आए थे।

बेटी के सामने उन्होंने अपने मन को बहुत संभालकर रखा था। चेहरे पर वही कठोरता थी, वही पिता वाला विश्वास—

“मेरी बेटी बहुत आगे जाएगी।”

लेकिन ट्रेन चल पड़ी तो आँखों के किनारे रोककर रखे आँसू आखिर छलक ही पड़े।

अंबिका खिड़की के पास खड़ी थी।

उसने अपना हाथ बाहर निकाला और पिता को बार-बार अलविदा कहने लगी।

उसके दोनों हाथ हवा में इस तरह लहरा रहे थे, मानो कोई कबूतर खुले आकाश में उड़ने से पहले अपने पंख फड़फड़ा रहा हो।

ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ती गई।

पिता वहीं खड़े रहे...

जब तक ट्रेन आँखों से ओझल नहीं हो गई।




26 दिसंबर 2024 — मुंबई

सुबह के लगभग आठ बजे अंबिका को कुर्ला स्टेशन उतरना था।

ट्रेन अब ठाणे पहुँच चुकी थी।

कुर्ला पहुँचने में लगभग चालीस मिनट बाकी थे।

और इधर, उसी समय, दीपक भी ठाणे जाने की तैयारी में था।

उसका ऑफिस भी ठाणे में ही था।

वह रोज ऑफिस की बस से जाता था। बस का किराया थोड़ा अधिक था, लेकिन सुविधा यह थी कि वह दीपक को उसके घर से उठाती और सीधे ऑफिस के गेट पर छोड़ देती।

वरना ट्रेन से जाना उसके लिए किसी परीक्षा से कम नहीं था—

बोरीवली से दादर,
दादर से ठाणे,
और फिर ठाणे से ऑफिस।

ऊपर से हाथ में laptop!

इसीलिए वह ऑफिस बस को ही प्राथमिकता देता था।

बस सुबह सात बजे उसके घर के पास आती थी।

लेकिन 26 दिसंबर की सुबह...

किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था।

दीपक बस पकड़ नहीं पाया।



अब उसके पास ट्रेन से जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।

वह जल्दी-जल्दी तैयार हुआ और सुबह 7:42 की ट्रेन पकड़कर चर्चगेट की ओर निकल पड़ा।

सुबह की भीड़ अपने पूरे शोर के साथ जाग चुकी थी।

दीपक लगभग 8:20 बजे दादर स्टेशन पहुँचा।

उसे आगे ठाणे जाना था।

उधर...

अंबिका भी लगभग उसी समय कुर्ला उतर चुकी थी।

नानी का घर अंधेरी में था, इसलिए उसे भी दादर होकर पश्चिमी लाइन की ट्रेन पकड़नी थी।

वह भी जल्दी-जल्दी चलती हुई लगभग 8:22 बजे दादर स्टेशन पहुँच गई।

बस दो मिनट का अंतर था।

दो साल से एक-दूसरे से दूर दो लोग...

आज एक ही शहर में थे।

एक ही स्टेशन पर थे।

और लगभग एक ही समय पर थे।

लेकिन दोनों इससे अनजान थे।

शायद किस्मत को अभी भी अपनी कहानी का सबसे सुंदर अध्याय लिखना बाकी था।

दीपक western लाइन से सेंट्रल लाइन की ओर जाने के लिए ऊपर बने पुल की सीढ़ियाँ चढ़ रहा था।

उसी पुल की दूसरी ओर से अंबिका सेंट्रल लाइन से पश्चिमी लाइन की तरफ जा रही थी।



दोनों एक-दूसरे की ओर बढ़ रहे थे।

सिर्फ कुछ कदमों का फासला था।

मगर मुंबई की सुबह की भीड़ में किसी को किसी की खबर कहाँ होती है!

अंबिका की ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आ चुकी थी।

उसे अंधेरी जाना था।

वह जल्दी में थी।

दीपक भी तेज कदमों से आगे बढ़ रहा था। उसका ध्यान मोबाइल पर था और पुल पर सुबह की भीड़ इतनी अधिक थी कि सामने चल रहे व्यक्ति का चेहरा देख पाना भी कठिन था।

और तभी—

अचानक अंबिका की किसी व्यक्ति से हल्की-सी टक्कर हो गई।

वह एक पल के लिए रुकी।

मगर सामने खड़ी ट्रेन छूटने वाली थी।

उसने पीछे मुड़कर देखने की भी कोशिश नहीं की।

उसे क्या पता था कि उसी एक क्षण में उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी कहानी उसके बिल्कुल पास से गुजर रही थी।

टक्कर के कारण उसके हाथ की घड़ी टूटकर नीचे गिर गई।

अंबिका को इसका ध्यान ही नहीं रहा।

वह सीढ़ियों से नीचे उतरकर प्लेटफॉर्म की ओर दौड़ गई।

दीपक की नजर तभी जमीन पर पड़ी।

उसने घड़ी उठाई।

उसने स्वाभाविक रूप से पीछे मुड़कर देखा—

“जिसकी होगी, शायद अभी यहीं होगी...”

लेकिन वहाँ कोई नहीं था।



भीड़ के बीच अंबिका गायब हो चुकी थी।

ट्रेन चल पड़ी।

और दीपक...

उसका चेहरा तक नहीं देख पाया था।

इसलिए उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि उसके हाथ में जो घड़ी थी...

वह किसी अनजान लड़की की नहीं,

अंबिका की थी।

दीपक ने घड़ी अपनी जेब में रख ली।

उसे ऑफिस के लिए देर हो रही थी।

वह दादर से ठाणे जाने वाली ट्रेन में चढ़ गया।

उसके लिए यह घटना बहुत मामूली थी।

एक घड़ी मिली थी।

किसी की खो गई थी।

बस इतनी-सी बात।

लेकिन अगर उसे यह पता होता कि वह घड़ी किसकी है...

तो?

अगर उस पल उसने मोबाइल की जगह सामने देखा होता...

अगर भीड़ कुछ कम होती...

अगर अंबिका एक पल के लिए पीछे मुड़ जाती...

अगर दीपक उसकी आँखों को पहचान लेता...

तो शायद दो साल की प्रतीक्षा उसी पुल पर समाप्त हो जाती।

लेकिन किस्मत को शायद अभी दोनों की मुलाकात इतनी जल्दी मंजूर नहीं थी।

क्योंकि अब कहानी बदल चुकी थी।

दीपक और अंबिका दोनों मुंबई में थे।

एक के पास दूसरे की घड़ी थी...

और दूसरे को यह तक पता नहीं था कि उसकी घड़ी किसके पास है।

क्या यह घड़ी अब दोनों के बीच वह धागा बनेगी, जो दो साल से अधूरी पड़ी कहानी को पूरा करने वाला है?

क्या दीपक उस अनजान लड़की को खोज पाएगा?

और सबसे बड़ा सवाल—

क्या इस बार अंबिका और दीपक सच में एक-दूसरे के सामने आएँगे?

या मुंबई की भीड़ एक बार फिर दोनों को आमने-सामने आकर भी जुदा कर देगी?

जानने के लिए जुड़े रहिए...

“मिस्टर राइटर और मैडम मिस्टीरियस”

क्योंकि कुछ मुलाकातें इंसान नहीं, किस्मत तय करती है... ❤️


Stay tuned for Part 7 of "Mr. Writer & Madam Mysterious"

जल्द आ रहा है… एक और शाम, एक और सच्चाई।

❤️ अगर कहानी पसंद आई हो, तो कमेंट ज़रूर करें। आपकी राय मेरे लिए मायने रखती है।





Comments

  1. Jab kismat ne dono ko ek hi platform pr la diya hai tho unka milna bhi jald hi hoga 🫶 mr writer ki chahat 🤌or madam mysterious ki sadgi 🤌jaise dono ek dusre ko pura kr rahe ho❣️
    This part is just🤌🤌waiting for next

    ReplyDelete
  2. तो फिर कहानी खत्म करने की जल्दी किसे है? 🫠❤️
    कुछ कहानियाँ मंज़िल के लिए नहीं…
    सफ़र को खूबसूरत बनाए रखने के लिए होती हैं। 📖✨

    और Mr. Writer & Madam Mysterious का सफ़र…
    अभी लंबा है। 😉🫶

    ReplyDelete
  3. Kayi baar Milne se kahani khatam nahi balki puri or or bhi majedaar bann jati hai jaise mano koi adhuri cheez puri or khubsurat ho gayi hai .☺️🫶mr writer or madam mysterious bhi milne ke baad or bhi khubsurat ho jayege☺️☺️ kahani bs chalti hi rahegi ♥️

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

Unspoken Bond Part 1 : लेक्चर हॉल की टेंशन

Episode 2 : Meena and the Microwave Monster

Episode 1 : The Signal Night (Alien Entry)