Bas Itna Hi Tha (बस इतना ही था) Part - 1 (Love Story )

Welcome to my story blog!
This is the beginning of an original Hindi love story, titled:

Bas Itna Hi Tha (बस इतना ही था)

Told in weekly parts, this story explores quiet heartbreak, unspoken love, and the kind of connection that lingers even after it’s gone.

If you’ve ever loved deeply — or lost without closure — I hope this story finds you.

This is Part One. Thank you for reading, and feel free to share your thoughts in the comments.

भाग – 1

देव और उसका अकेलापन

                                  


देव को दूसरों से बात करना बेहद मुश्किल लगता था। इसकी वजह यह नहीं थी कि वह अंतर्मुखी था, बल्कि इसलिए क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसके मुँह से कोई ऐसा शब्द निकल जाए जो सामने वाले के दिल को ठेस पहुँचा दे।देव कभी भी सिर्फ अच्छा लगने के लिए झूठ नहीं बोल पाता था...


                               

शायद वह इस दुनिया को समझ नहीं पा रहा था, और उसे यह भी नहीं आता था कि अपनी बातों से किसी का दिल कैसे जीता जाए। यही असमंजस धीरे-धीरे उसे एक अलग तरह का इंसान बना रहा था — ऐसा इंसान जो भीतर से बहुत कुछ महसूस करता था, लेकिन बाहर से चुपचाप रहता था।

                                

यह डिग्री का पहला साल था। देव ने हाल ही में कॉलेज में दाखिला लिया था। करीब साठ छात्रों की उस कक्षा में वह किसी को जानता तक नहीं था — और जानने की कोशिश भी नहीं करना चाहता था।

                                

हर लेक्चर में वह नियमित रूप से आता, सबसे आगे या कोने की किसी सीट पर चुपचाप बैठ जाता, पर फिर भी वह कक्षा के लिए एक अनजान चेहरा ही बना रहा।

                                 


उसकी खामोशी ऐसी थी कि कोई उसके पास बैठने से हिचकता, और जो कभी पास बैठ भी जाता, वो भी बिना कुछ कहे बस लेक्चर खत्म होने का इंतज़ार करता।कॉलेज की ये नई ज़िंदगी देव के लिए कुछ खास नहीं रही... सब कुछ होते हुए भी उसमें कुछ अधूरा सा था।


                                

देव की यह खामोश ज़िंदगी बाहर से भले ही शांत दिखती हो, पर अंदर ही अंदर वह लगातार बेचैनी से जूझ रहा था। उसकी यही चुप्पी उसे भीतर से खोखला करने लगी थी।

                                

जब भी उसके भीतर भावनाओं का सैलाब उमड़ता, जब वह अपने आप को सबसे अलग और भरा-भरा महसूस करता — तब वह बस अपने मोबाइल में कुछ न कुछ लिखने लग जाता।




                                    

                                हाँ, देव एक बेहतरीन लेखक था। वह कहानियाँ लिखता था, कविताएँ रचता था, और भावनाओं को शब्दों में ढालने में उसे जैसे कोई महारत हासिल थी।

                                

कॉलेज का पहला साल अब अपने अंत की ओर था... मगर आज तक कॉलेज में उसका एक भी दोस्त नहीं बना था।                        

                                

कॉलेज का दूसरा साल भी अब खत्म होने को आया था। सौभाग्य से, इस साल देव को दो दोस्त मिल गए थे — करण और सुमित। पर जैसा कि कहा जाता है, इंसान अक्सर अपने जैसे ही लोगों की संगत चुनता है। करण और सुमित भी देव की ही तरह शांत, कम बोलने वाले और भीतर बहुत कुछ महसूस करने वाले थे। 


                               



 इसी बीच, देव की थोड़ी बहुत जान-पहचान एक सीनियर छात्र, अभिषेक से भी हो गई थी। अभिषेक कॉलेज के तीसरे वर्ष में था और एक कॉलेज इवेंट के दौरान उसकी और देव की पहली मुलाक़ात हुई थी। 




अभिषेक को जल्द ही यह पता चल गया था कि देव लिखने का शौक़ीन है। वह उसकी कविताएँ पढ़ता और हर बार देव की लेखनी की दिल से सराहना करता। अभिषेक ही वह पहला इंसान था जिसने देव की इस कला को न सिर्फ पहचाना, बल्कि खुले दिल से उसे प्रोत्साहित भी किया। 



 मगर ठीक उसी समय, जब दूसरे वर्ष की फाइनल परीक्षाएँ करीब थीं, देश के प्रधानमंत्री ने अचानक लॉकडाउन की घोषणा कर दी। कोविड का प्रकोप धीरे-धीरे पूरे देश में फैल रहा था... और इस महामारी ने न जाने कितनी ज़िंदगियाँ छीन ली थीं। बहुत से परिवार उजड़ गए थे, और हर तरफ़ एक अनदेखा, अनकहा डर पसरा हुआ था। दूसरे वर्ष की फाइनल परीक्षा अब स्थगित हो चुकी थी। सभी को उम्मीद थी कि शायद एक महीने में हालात संभल जाएंगे, लॉकडाउन हटेगा और वे वापस कॉलेज जाकर अपनी परीक्षाएँ दे सकेंगे। 



लेकिन हालात सुधरने की बजाय और बिगड़ते जा रहे थे। अब सारे छात्र दिनभर घर पर बैठे रहते — कोई मोबाइल पर व्यस्त रहता, कोई टीवी में खोया रहता। बाहर की खुली हवा, दोस्तों की हल्की हँसी, कैंटीन की चाय — सब कुछ जैसे किसी पुराने ख़्वाब में बदल चुका था। जो बच्चे पहले पूरे दिन घर से बाहर रहते थे, अब वही बाहर की एक झलक को तरसने लगे थे। 


जिन माँ-बाप ने पूरी उम्र बाहर मेहनत करके अपने परिवार का पेट पाला था, अब वही मजबूरी में घर बैठने को मजबूर थे। मध्यम वर्गीय परिवारों की हालत सबसे ज़्यादा बिगड़ती जा रही थी — न नौकरी की गारंटी, न आमदनी का कोई ज़रिया। डर और असमर्थता की एक चादर पूरे समाज पर फैल गई थी।


इन्हीं दिनों की एक दोपहर, देव को एक अजीब-सा नोटिफिकेशन मिला — “Abhishek added you to the group ‘The Quarantine Writers’” देव थोड़ा हैरान हुआ। 


उसने तुरंत अभिषेक को व्हाट्सएप पर मैसेज किया — "मुझे किस ग्रुप में ऐड किया है? और क्यों?"

उसका अंदाज़ बाहर से भले ही सामान्य था, लेकिन अंदर ही अंदर उसके मन में हलचल मच गई थी।

"आख़िर ये क्या नया सिलसिला है?"
ग्रुप का नाम बार-बार उसकी आँखों के सामने घूम रहा था — एक अजीब सा नाम, जो जैसे कुछ राज़ छुपाए बैठा हो।

उसका मन सवालों से भर गया था —
"कौन हैं इस ग्रुप में?"
"क्यों मुझे जोड़ा गया?"

जितना वो सोचता, उतनी ही उसकी जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी... मानो कोई दरवाज़ा खुलने वाला हो, जो अब तक बंद था — और उसके पीछे था कुछ चौंकाने वाला। 😯🔍💭



आख़िर वो ग्रुप किसलिए था? और अभिषेक ने देव को उसमें क्यों जोड़ा था? क्या इस ग्रुप की वजह से देव की ज़िंदगी में कोई बड़ा बदलाव आने वाला था??? 😯🔥

सोचो ज़रा... क्या ये बस एक आम ग्रुप था, या फिर कुछ ऐसा जो देव की पूरी दुनिया ही पलट कर रख देगा? 😳💥

Stay tuned for Part 2 of "Bas Itna Hi Tha"
जल्द आ रहा है… एक और शाम, एक और सच्चाई।

❤️ अगर कहानी पसंद आई हो, तो कमेंट ज़रूर करें। आपकी राय मेरे लिए मायने रखती है।

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

Unspoken Bond Part 1 : लेक्चर हॉल की टेंशन

Twaif Chapter 1: The Jungle Night