बस इतना ही था Part - 2 (Love Story )
Welcome to my story blog!
This is Part Two of an original Hindi love story, titled:
Bas Itna Hi Tha (बस इतना ही था)
Told in weekly parts, this story explores quiet heartbreak, unspoken love, and the kind of connection that lingers even after it’s gone.
If you’ve ever loved deeply — or lost without closure — I hope this story finds you.
Thank you for reading, and feel free to share your thoughts in the comments.
भाग – 2
जैसा की पार्ट १ के आखिरी में हमने देखा था की , देव को एक अजीब-सा नोटिफिकेशन मिला —
“Abhishek added you to the group ‘The Quarantine Writers’”
देव थोड़ा चौंका।
उसने तुरंत अभिषेक को व्हाट्सएप पर लिखा:
"मुझे किस ग्रुप में ऐड किया है? और क्यों?"
उसका लहजा भले ही सामान्य था, पर भीतर कहीं हल्की सी बेचैनी थी।
‘The Quarantine Writers’ — नाम में ही कुछ ऐसा था जो उसे खींच रहा था…
मानो यह किसी नए अध्याय की शुरुआत हो।
काफी देर तक अभिषेक का कोई जवाब नहीं आया। देव ने सोचा शायद उसने मैसेज देखा ही नहीं, या फिर शायद कोई और बात है। लेकिन उसी शाम अचानक अभिषेक का मैसेज आया — "ये एक राइटर्स का ग्रुप है। यहाँ कई सारे कविता प्रतियोगिताएँ होती हैं। उनके सारे अपडेट्स इसी ग्रुप में आते हैं। और हाँ… ये ग्रुप मैंने ही बनाया है।” देव ने मैसेज पढ़ा और कुछ देर के लिए शांत हो गया। उसे थोड़ा अच्छा लगा — कम से कम कोई है जो उसे उसकी लेखनी से जोड़ने की कोशिश कर रहा है।
अगले ही दिन उस ग्रुप में एक नया मैसेज आया — "इस महीने के अंत में एक कविता-संग्रह (Poetry Book) प्रकाशित की जा रही है। जो भी सदस्य अपनी कविता उसमें शामिल करवाना चाहते हैं, वे मुझे व्यक्तिगत रूप से अपनी रचनाएँ भेजें। जिनकी कविताएँ चुनी जाएँगी, उन्हें पुस्तक में स्थान मिलेगा।" — यह मैसेज अवंतिका का था, जो उस ग्रुप की एक सक्रिय सदस्य थी।
देव ने वह मैसेज पढ़ा... और स्क्रीन पर नज़रें टिकाए रहा। वह बहुत अच्छी कविताएँ लिखता था — उसकी पंक्तियाँ दिल को छू जाती थीं, पर उसमें आत्मविश्वास की कमी थी। उसे हमेशा यही लगता था कि शायद उसकी कविताएँ उतनी खास नहीं हैं, शायद लोग उन्हें समझ नहीं पाएँगे। वह सोचता रहा — "क्या मुझे भेजनी चाहिए? क्या मैं इस लायक हूँ?" दिल में कई सवाल थे, और जवाब कोई नहीं। लेकिन देर रात, जब सब कुछ शांत था और वह अपनी डायरी के पुराने पन्ने पलट रहा था, एक पंक्ति उसकी नज़र में ठहर गई — "अगर डर से ऊपर उठ सको, तो शब्द तुम्हारे अपने हो जाते हैं।"
अगली सुबह देव ने अपनी वही पुरानी डायरी निकाली — नीले रंग की, जिसकी जिल्द अब हल्की सी उधड़ने लगी थी। जैसे वक्त ने उसकी बाहरी परत छील दी हो, पर भीतर अब भी वही कहानियाँ महफूज़ थीं। पन्नों की परतों पर उसकी उँगलियों की आदतें अब भी दर्ज थीं — कुछ खामोशियों के निशान, कुछ अधूरी साँसें।
काफ़ी देर तक वह यूँ ही पन्ने पलटता रहा, हर कविता को देखता, छूता… जैसे कोई पुराना ज़ख्म सहलाता हो।
हर कविता किसी एक एहसास से बंधी थी —
कोई अकेलेपन की थी,
कोई टूटी उम्मीद की,
तो कोई ऐसी बात की, जो कभी किसी से कह न सका।
अंत में, उसने एक कविता चुनी — वो जो उसने उस वक़्त लिखी थी जब सब होते हुए भी वह खुद से सबसे ज़्यादा दूर था।
शब्द कम थे, पर उनमें एक गूंगी चीख छुपी थी।
उसने धीमे हाथों से उसे टाइप किया, और कांपती उंगलियों से अवंतिका को व्हाट्सएप पर भेज दिया।
भेजने के बाद, जैसे उसके दिल ने साँस रोक ली हो।
उसका सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे उठने लगा, जैसे कोई अदृश्य जंग छिड़ गई हो भीतर।
वो बार-बार मोबाइल उठाता, स्क्रीन देखता — कोई "typing..." नहीं, कोई नीली टिक नहीं।
समय कट नहीं रहा था।
हर मिनट एक छोटा सा डर बनकर उसके मन में उतरता गया।
शाम के सात बजे के करीब उसका फोन वाइब्रेट हुआ।
स्क्रीन पर एक नाम चमका — Avantika।
"Dev… this is beautiful.
सच में बहुत दिल से लिखी गई है ये कविता।
Is it okay if I keep this for the book?"
देव कुछ पल तक मोबाइल को यूँ ही देखता रह गया।
उसके लिए यह सिर्फ एक जवाब नहीं था —
यह पहली बार था जब किसी ने उसके मन के कोनों को बिना शोर के छू लिया था।
उसकी आँखों में अनजाने ही नमी तैर गई।
शायद पहली बार, किसी अजनबी ने उसकी रूह की हलचल को सुना था।
उसने धीरे से जवाब लिखा —
"Yes… sure. Thank you so much."
उस रात, देव ने एक नई कविता लिखी।
पर इस बार, वह कविता अकेलेपन से नहीं निकली थी —
वह निकली थी किसी मुस्कान की परछाईं से।
पहली बार, उसने शब्द खुद के लिए नहीं…
बल्कि किसी और की ख़ुशी के लिए बुनें थे।
दिन बीतते गए…
कविता-संग्रह की तैयारी अब अपने अंतिम चरण में थी। ग्रुप में हर कोई अपने हिस्से की रचनाओं को संवार रहा था, आखिरी बार polishing कर रहा था।
चारों ओर उत्साह था — लेकिन देव के लिए यह सब एक साधारण प्रक्रिया नहीं थी।
यह सिर्फ एक किताब नहीं थी…
बल्कि एक मौन आवाज़ का पहली बार दस्तावेज़ बनना था।
उसकी कविता, जो कभी अकेलेपन में लिखी गई थी, अब एक साझा मंच का हिस्सा बनने जा रही थी।
जहाँ बाकी लेखक अपनी कल्पनाओं से लिखते थे, वहाँ देव ने अपने ज़ख्मों से लिखा था।
कुछ दिनों बाद एक और मैसेज आया:
“Poetry book ‘Quarantine Ke Jazbaat’ अगले हफ्ते प्रकाशित की जा रही है। सभी लेखक इसका डिजिटल संस्करण शेयर कर सकेंगे।”
देव ने स्क्रीन पर उभरे उन शब्दों को कुछ देर तक बस निहारते हुए पढ़ा।
धीरे से एक मुस्कान उसके होंठों पर आई — महीनों बाद आई थी,
पर इस बार वह मुस्कान बिना किसी मजबूरी के आई थी।
फिर वह दिन आया।
बुक लॉन्च का वर्चुअल इवेंट ज़ूम पर आयोजित हुआ।
स्क्रीन पर एक-एक कर सबके चेहरे उभरे — अभिषेक, अवंतिका, और बाकी लेखक।
देव भी लॉगिन हुआ, लेकिन माइक पर कुछ बोल न सका।
पर जब एंकर ने उसका नाम लिया, उसकी कविता का ज़िक्र किया, और कुछ पाठकों की प्रतिक्रियाएं पढ़ीं —
तो उसे पहली बार लगा कि उसकी खामोशी भी कुछ कह सकती है।
इवेंट खत्म होने के कुछ देर बाद अवंतिका का मैसेज आया:
“तुम्हारी कविता को सबसे ज़्यादा लाइक्स मिल रहे हैं…
तुम्हें अंदाज़ा है, तुमने कितनों के दिल को छू लिया है?”
देव कुछ पल तक स्क्रीन देखता रहा — जवाब लिखने से पहले उसे लगा जैसे कुछ भीतर पिघल रहा हो।
उसने धीरे से टाइप किया:
“शायद पहली बार समझ पा रहा हूँ कि मेरे शब्द सिर्फ मेरे नहीं हैं…”
फिर एक सिलसिला शुरू हुआ —
छोटे-छोटे मैसेजों का, जिनमें सिर्फ कविताएं नहीं थीं।
अब बात उन पलों तक जा पहुँची थी जहाँ
अकेलापन, अधूरे ख़्वाब, डर, उम्मीद और चुप रह जाने की आदतें
एक-दूसरे के सामने खुलने लगी थीं।
अवंतिका के जवाबों में कोई दिखावा नहीं था — और यही बात देव को बाँधती जा रही थी।
वह अब पहले जैसा नहीं रहा था।
उसे अब अपने शब्दों पर यकीन होने लगा था —
और थोड़ा-सा खुद पर भी।
लेकिन क्या हर भावना, जो शब्दों से जुड़ती है…
हमेशा वैसी ही होती है जैसी वो दिखती है?
या फिर देव की कविताओं में कुछ ऐसा छुपा है,
जिसे अब तक अवंतिका ने पढ़ा ही नहीं…?
[जारी है…]
Stay tuned for Part 3 of "Bas Itna Hi Tha" —
जल्द आ रहा है… एक और शाम, एक और सच्चाई।
❤️ अगर कहानी पसंद आई हो, तो कमेंट ज़रूर करें। आपकी राय मेरे लिए मायने रखती है।
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