बस इतना ही था Part - 3 (Love Story )

 Welcome to my story blog!

This is Part Three of an original Hindi love story, titled:

Bas Itna Hi Tha (बस इतना ही था)

Told in weekly parts, this story explores quiet heartbreak, unspoken love, and the kind of connection that lingers even after it’s gone.

If you’ve ever loved deeply — or lost without closure — I hope this story finds you.

Thank you for reading, and feel free to share your thoughts in the comments.

भाग – 3  अवंतिका एक पहेली 

                                          

जैसा की लास्ट पार्ट में हमने देखा था की अब देव और अवंतिका के बातचीत बढ़ गयी थी, लेकिन क्या हर भावना, जो शब्दों से जुड़ती है…
हमेशा वैसी ही होती है जैसी वो दिखती है?
या फिर  देव की कविताओं में कुछ ऐसा छुपा है,

जिसे अब तक अवंतिका ने पढ़ा ही नहीं…?


कॉलेज अब धीरे-धीरे फिर से खुल चुका था। दो सालों की खामोशी के बाद कैंपस में फिर से रौनक लौट रही थी — हँसी की आवाज़ें, दोस्तों की भीड़, और क्लासरूम में गूंजती चहल-पहल।



देव भी अब पहले जैसा नहीं रहा था। अब वो थोड़ा कम चुप रहता था, अपने शब्दों को सिर्फ डायरी तक सीमित नहीं रखता था। कभी-कभी किसी कविता कार्यक्रम में मंच पर भी बोल देता था — और लोग सुनते थे, सराहते थे। लेकिन... उस बदलाव के पीछे एक चेहरा था — अवंतिका का। 



धीरे-धीरे देव के मन में अवंतिका के लिए एक खास जगह बनने लगी थी। वो सिर्फ उसकी तारीफ़ों से नहीं, बल्कि उसके सोचने के तरीके से, उसकी नज़रों में जीवन को देखने के अंदाज़ से प्रभावित हो गया था। उसकी सादगी, उसकी बातों में छिपी गहराई, और सबसे बढ़कर — उसकी भक्ति। 



हाँ, अवंतिका भगवान शिव की अनन्य भक्त थी। वो अक्सर अपने स्टेटस में शिव के श्लोक डालती, ग्रुप में ‘महादेव’ के नाम से जुड़ी कविताएँ शेयर करती — और जब भी देव उससे बात करता, कहीं न कहीं उसका ध्यान हमेशा शिव की ओर मुड़ जाता। 



एक दिन देव ने साहस जुटाकर उससे पूछा — "तुम्हें कभी किसी इंसान से प्यार हुआ है?" अवंतिका ने बिना हिचके जवाब दिया: "हुआ है… और अब भी है।" देव का दिल थोड़ी देर के लिए ठहर गया। उसने थोड़े संकोच से अगला सवाल पूछा — "कौन है वो?" अवंतिका ने मुस्कराते हुए जवाब दिया: "भोलेनाथ। मेरे जीवन में सिर्फ वही हैं। मैं उनसे प्रेम करती हूँ, उन्हीं में सब कुछ देखती हूँ। और सच कहूँ तो… अब दिल में किसी और के लिए जगह नहीं बची।"  



देव ने वो जवाब पढ़ा… और जैसे भीतर कुछ टूट कर चुपचाप बिखर गया। उसने कुछ नहीं कहा। ना उलाहना दिया, ना कोई सफाई माँगी। बस फोन रखा… 




और उस रात एक नई कविता लिखी — "मैं उस राह पर चला था, जहाँ उम्मीद के फूल खिले थे, पर सामने जो थी, वो खुद शिव की थी — और मैं सिर्फ एक पथिक..." 


कॉलेज अब अंतिम वर्ष में आ चुका था। ऑनलाइन क्लासेज़ खत्म हो चुके थे और बहुत से छात्र अब अपने भविष्य की तैयारियों में व्यस्त थे — कोई जॉब की तलाश में, कोई किसी एग्ज़ाम की कोचिंग में। देव अब मुम्बई में ही एक छोटे से कोचिंग सेंटर में पार्ट टाइम पढ़ाने लगा था। 



वो चाहता था कि पढ़ाई के साथ-साथ वह खुद को व्यस्त रखे — क्योंकि ख़ालीपन उसे फिर से अंदर से तोड़ने लगता था। मगर... हर दिन जब वो थककर घर लौटता ।




किसी कविता को पूरा नहीं कर पाता, या जब अपने अंदर के खालीपन से हारने लगता — तो उसकी उंगलियाँ बिना सोचे एक नाम पर टिक जातीं: "Avantika 🌸" और हर बार — अवंतिका जवाब देती थी। शब्दों से नहीं... एहसासों से।  "देव, याद है तुमने लिखा था — 'अगर डर से ऊपर उठ सको, तो शब्द तुम्हारे अपने हो जाते हैं'? तो आज डरो मत। लिखो, बस लिखो... जैसे तुम शिव से बात कर रहे हो।" 



देव मुस्करा देता। अक्सर उसकी आँखों में नमी आ जाती, पर ये वो नमी होती थी जो उसे फिर जीना सिखाती थी। उनकी बातचीत अब कोई प्रेम प्रसंग नहीं थी — यह आत्मिक स्नेह था, जहाँ शब्द दवा थे और भावनाएँ प्रार्थना। 




अवंतिका अब उत्तराखंड में एक स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थी। उसके पास ज़्यादा समय नहीं होता, लेकिन जब भी देव का मैसेज आता, वो भले दो मिनट ही सही — जवाब ज़रूर देती। 
"तुम हारते नहीं हो देव... तुम थकते हो। और थकना बुरा नहीं है — रुककर साँस लेना भी जीवन का हिस्सा है।"



कई बार देव उसे कॉल करना चाहता, उसकी आवाज़ सुनना चाहता — पर वो खुद को रोक लेता था। शायद इसलिए नहीं कि वो डरता था, बल्कि इसलिए कि अब उसे शब्दों में ही सुकून मिलने लगा था। 
एक शाम, जब मुंबई की बारिश खिड़की से टकरा रही थी और देव अकेले बैठा अपनी अधूरी कविता देख रहा था, अवंतिका का एक मैसेज आया: 
"तुम जानो या ना जानो, तुमने मेरे जैसे न जाने कितनों को जीना सिखाया है। तो जब भी खुद को खोया हुआ महसूस करो — बस ये याद रखना: 'तुम्हारे शब्द तुम्हारी रूह हैं... और रूहें कभी खोती नहीं।'" देव देर तक उस स्क्रीन को देखता रहा। 



उसने मोबाइल एक तरफ रखा... एक नई कविता लिखने बैठा। और इस बार उसने जो लिखा, वो अवंतिका के लिए नहीं था — बल्कि उस अपने-आप के लिए, जिसे वो भूल बैठा था। 



अब देव को यह समझ गया था की अवंतिका का देव की जिंदगी में कोई सामन्य भूमिका नहीं है वह उसके लिए काफी इम्पोर्टेन्ट बन चुकी थी यह बात देव उसको बताना चाहता था पर क्या देव उसे बोल पायेगा अपने दिल की बात, देखते हैं अगले पार्ट में .....

[जारी है…]

Stay tuned for Part 4 of "Bas Itna Hi Tha" —
जल्द आ रहा है… एक और शाम, एक और सच्चाई।



                                            

❤️ अगर कहानी पसंद आई हो, तो कमेंट ज़रूर करें। आपकी राय मेरे लिए मायने रखती है।




Comments

Popular posts from this blog

Bas Itna Hi Tha (बस इतना ही था) Part - 1 (Love Story )

Unspoken Bond Part 1 : लेक्चर हॉल की टेंशन

Twaif Chapter 1: The Jungle Night