बस इतना ही था Part - 5 (Love Story )

 Welcome to my story blog!

This is Part Five of an original Hindi love story, titled:

Bas Itna Hi Tha (बस इतना ही था)

Told in weekly parts, this story explores quiet heartbreak, unspoken love, and the kind of connection that lingers even after it’s gone.

If you’ve ever loved deeply — or lost without closure — I hope this story finds you.

Thank you for reading, and feel free to share your thoughts in the comments.

भाग – 5  "चोट थोड़ी थी… पर ख्याल गहरा"

जैसा की लास्ट पार्ट में हमने देखा की देव ने अवंतिका को अब अपनी आदत बना लिया है, इस पार्ट में हम देखेंगे की क्या उसे इस आदत के कारन क्या क्या झेलना पड़ेगा .......

                            

उस दिन दोपहर की नींद अधूरी ही रह गई थी। देव की आँखें तब खुलीं जब फोन की स्क्रीन हल्की रोशनी में चमकी — अवंतिका का मैसेज था: 

“आज छोटू को चोट लग गई… सीढ़ियों से फिसल गया था। थोड़ा डर गया हूँ।” 

                             

देव का मन जैसे एकदम सतर्क हो गया। उसने जल्दी से जवाब दिया: 

 “Oh no… बहुत चोट लगी क्या?”  


“नहीं, मामूली सी है। माथे पर हल्का कट है। ड्रेसिंग हो गई… लेकिन बच्चा डर गया। और मम्मी भी।” 


देव कुछ देर तक स्क्रीन देखता रहा, फिर धीरे से टाइप किया: 

“तुम ठीक हो ना? जब कोई अपना तकलीफ में हो, तो हम उससे भी ज़्यादा टूट जाते हैं।” 

अवंतिका:   “हाँ, मैं ठीक हूँ। बस, अचानक सब हुआ तो घबरा गई थी। अब वो सो गया है।” 


देव चाहकर भी उससे ज़्यादा कुछ कह नहीं पाया। वो बस सोचता रहा — “काश मैं वहाँ होता… सिर्फ ये कहने के लिए कि सब ठीक हो जाएगा।” उसने लिखा:  “शायद कुछ कहने की ज़रूरत नहीं होती… बस किसी का चुपचाप साथ होना ही सबसे बड़ी राहत होती है।” 


अवंतिका ने कुछ पल बाद लिखा:   “शुक्रिया, Dev… तुम हमेशा उसी वक़्त सामने आ जाते हो, जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है। और… बिना कुछ मांगे चले भी जाते हो।” 


देव मुस्कुरा दिया — जैसे उसका बिना कहे कहा जाना ही उसकी पूरी प्रेम-कहानी थी। --- उस रात, देव ने डायरी में बस एक पंक्ति लिखी:  "मैंने कभी तुम्हें पाने की ज़िद नहीं की… मैंने बस तुम्हारे दुःख में शामिल होने का हक़ माँगा था।"


वो रविवार की सुबह थी। देव अपने कमरे में चाय के कप के साथ अख़बार पलट रहा था। 



दुनिया के मुद्दे, राजनीति, बाजार — सब नजरें सरकाते हुए वो स्थानीय कॉलेज इवेंट्स के पन्ने पर पहुँचा। और वहीं... एक फोटो ने उसके हाथ रोक दिए। एक रंगीन फोटो थी — "राजकीय महाविद्यालय, ऋषिकेश" की तरफ़ से आयोजित तलवारबाज़ी प्रतियोगिता की। छात्राओं की एक टीम खड़ी थी, हाथों में तलवार, माथे पर पट्टी, और चेहरे पर गर्व। 



उसमें... सबसे बाईं ओर खड़ी एक लड़की थी — मुस्कराती हुई, पर उसकी आँखों में जैसे कोई शांत-सी आग थी। फोटो के नीचे नाम छपे थे।  "बाईं ओर से तीसरी: Avantika Sharma" देव की धड़कन एक पल को थम गई।  "अवंतिका...? यही वो है?" उसने फिर से फोटो देखा… धीरे-धीरे ज़ूम किया… वो चेहरा, जो अब तक सिर्फ शब्दों से बना था — अब आँखों के सामने था। 



उसने महसूस किया कि वो उसे पहले से जानता है, जैसे उसकी आँखें उस कविता की पंक्तियों में कई बार उतर चुकी थीं। वो हल्के से मुस्कराया, फिर फोन उठाया — अवंतिका को व्हाट्सएप पर मैसेज किया:  “Breaking news: Avantika Sharma seen holding a sword and a smile. भगवान शिव भी डर जाएँ ऐसी तलवारबाज़ से।”



 😄 अवंतिका ने तुरंत रिप्लाई किया:  “Areee… तुमने अख़बार पढ़ा? पहली बार मेरी कोई फोटो किसी paper में आई और तुमने देख भी ली?” 



 देव:  “पहली बार नहीं... ये पहली बार है जब तुम्हारा चेहरा देखा है। अब तक बस शब्द थे, अब एक तस्वीर है — और हाँ, वैसी ही निकली हो जैसी कल्पना थी…” 



 “कैसी?” — अवंतिका ने हल्के से पूछा। 
देव ने थोड़ी देर बाद लिखा:  “शांत… पर मज़बूत। जैसे एक साध्वी तलवार उठा ले — और लोग लड़ाई के बजाय उसकी आंखों में शांति ढूंढने लगें।” 



 अवंतिका typing कर रही थी… फिर लिखा:  “तुमने मुझे कभी देखा नहीं था… फिर भी इतना समझ पाए?” 

 देव:  “शब्द कभी चेहरा नहीं माँगते… वो बस मन से जुड़ते हैं — और तुम तो मेरी सबसे प्रिय पंक्ति हो, अवंतिका।” --- 



 उस दिन देव ने अपनी डायरी में कुछ नहीं लिखा। बस अख़बार का वो पन्ना फोल्ड करके डायरी में रख लिया… जैसे किसी बहुत पुराने खत के बीच रखा गया पहला गुलाब।


अब हम अगले पार्ट में देखेंगे की किस तरीके से देव अपने दिल की बात अवंतिका को बताएगा ?

[जारी है…]

Stay tuned for Part 6 of "Bas Itna Hi Tha" —
जल्द आ रहा है… एक और शाम, एक और सच्चाई।

                                            

❤️ अगर कहानी पसंद आई हो, तो कमेंट ज़रूर करें। आपकी राय मेरे लिए मायने रखती है।

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