बस इतना ही था Part - 6 (Love Story )

Welcome to my story blog!

This is Part Six of an original Hindi love story, titled:

Bas Itna Hi Tha (बस इतना ही था)

Told in weekly parts, this story explores quiet heartbreak, unspoken love, and the kind of connection that lingers even after it’s gone.

If you’ve ever loved deeply — or lost without closure — I hope this story finds you.

Thank you for reading, and feel free to share your thoughts in the comments.

भाग – 6  "जब अनकही बातों को कोई और भी समझने लगे… "

जैसा की लास्ट पार्ट में हमने देखा की देव ने अवंतिका को अब अपनी आदत बना लिया है, इस पार्ट में उनके बीच का नजदीकियों में हम दूरियों को कम होते देखेंगे....

                            


उस दिन देव ने अपनी छोटी बहन, नीति के जन्मदिन पर एक प्यारा-सा स्टेटस डाला था — एक पुरानी तस्वीर, उसके साथ कुछ पंक्तियाँ:  “हर घर में एक फरिश्ता होता है, मेरे घर में वो बहन के नाम से जानी जाती है। Happy Birthday, Niti 🎂💫” 


कुछ ही देर बाद, अवंतिका का मैसेज आया:  “Aww… sweet pic. Didi ko Happy Birthday bolna meri तरफ़ से भी 😊🎉” 


देव मुस्कराया। फिर उसने हल्के से लिखा:  “Tum khud hi बोल दो उसे।” 

“Arey… मैं क्यों बोलूं? Didi mujhe जानती भी नहीं 😅” देव ने जवाब दिया — थोड़ा छुपते हुए, थोड़ा सच बताते हुए:  “जानती है… काफ़ी बार देखा है मुझे तुमसे chat करते हुए।”  “Ohhh really? 😳 तो क्या बताते हो तुम  मुझे?” — अवंतिका ने टाइप किया। 


देव ने मुस्कराकर लिखा:  “बस यही… कि एक दोस्त है, जो हमेशा सही वक़्त पर सही बात कह देती है… और… जिसकी बातें कभी-कभी मेरी कविता से भी सुंदर लगती हैं।” अवंतिका ने एक blush वाला स्टीकर भेजा। पर उसने नहीं जाना… कि देव की बहन, नीति, पहले से सब समझती थी। 

                                                 

एक दिन नीति ने teasing अंदाज़ में देव से पूछा:  “भाई… ये ‘Avantika’ नाम की जो mystery girl है, उससे दिन में कितनी बार बात करता है तू?” देव ने नज़रें चुराते हुए कहा:  “बस… दोस्त है।” 


नीति ने शरारत से मुस्कराकर कहा:  “अच्छा… तो वो दोस्त है जिसके आने से तू चुप रहकर भी मुस्कराने लगा?” देव कुछ नहीं बोला। फिर नीति ने धीरे से उसकी कंधे पर हाथ रखा और कहा:  “मैं सब समझती हूँ भाई… तेरी आँखें बोल देती हैं जो तू शब्दों में नहीं कह पाता।”  “पर एक बात बोलूँ?”  “अगर वो लड़की तेरी कविता समझती है… तो शायद एक दिन तेरा दिल भी समझ लेगी।” 


देव हल्का मुस्कराया, पर फिर बोला:  “बस ये बात अवंतिका को मत बोलना… कहीं उसे लगे कि मैं कोई उम्मीद पाल रहा हूँ।” नीति ने सिर हिलाया… और बोली:  “ठीक है भाई… पर अगर कभी उसकी आँखें तेरी पंक्तियों में खुद को ढूँढने लगे, तो बता देना — ये काम सबसे पहले बहन ने किया था।” 


अवंतिका को ये सब नहीं बताया गया। देव अब भी बस उतना ही ज़ाहिर करता, जितना ज़रूरी था। बाक़ी सब उसने अपने अंदर… और अपनी बहन के मुस्कराते हुए समझते दिल में संभाल कर रखा था।


एक शाम, जब बारिश हल्के-हल्के देव की खिड़की को भिगो रही थी, अवंतिका ने टाइप किया:  “पता है, कभी-कभी लगता है… कुछ लोग ज़िंदगी में बस ऐसे ही आते हैं — जैसे बारिश की वो पहली बूंद… जो गिरते ही मिट्टी से खुशबू निकाल देती है।” 


देव थोड़ी देर तक टाइपिंग स्क्रीन देखता रहा, फिर लिखा:  “और फिर… बूंद सूख जाती है, लेकिन खुशबू रह जाती है।” अवंतिका ने कुछ नहीं कहा। दोनों जानते थे कि वो बात बूंदों की नहीं थी। 


 देव कई बार चाहता कि वह कह दे — कि "तू मेरी हर कविता के पीछे खड़ी भावना है..." पर फिर चुप हो जाता।


उसे डर था कि कहीं वो जो कुछ थोड़ा-सा है — वो भी चला न जाए। और अवंतिका? वो भी अब महसूस करने लगी थी… कि जब कभी देव दोपहर तक मैसेज नहीं करता, तो मन बेचैन रहता है। 


जब देव कोई नई कविता भेजता, तो वो उसे बार-बार पढ़ती — और कभी-कभी सोचती:  “क्या ये मेरे लिए है?” पर फिर खुद को समझा लेती, “नहीं… शायद वो तो बस यूँ ही लिख देता है…” 


दोनों हर रोज़ पास थे, लेकिन सच से दूर। कभी मज़ाक में कुछ कह देते, तो अगले ही पल बदल देते बात — जैसे दोनों ही इस खूबसूरत भ्रम को तोड़ना नहीं चाहते थे। 


उस रात, देव ने अपनी डायरी में बस इतना लिखा:  “हम दोनों एक ही नाव में हैं… पर इस डर से कि कोई डूब न जाए — हम दोनों किनारे से ही बात करते रहते हैं।”


अगले पार्ट में हम देखेंगे की हम देखेंगे की पहले अवंतिका देव को अपने दिल की बात बोलेगी या देव उसे , इसके बाद उनका रिएक्शन क्या होगा ?

[जारी है…]

Stay tuned for Part 7 of "Bas Itna Hi Tha" —
जल्द आ रहा है… एक और शाम, एक और सच्चाई।

                                            

❤️ अगर कहानी पसंद आई हो, तो कमेंट ज़रूर करें। आपकी राय मेरे लिए मायने रखती है।

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