बस इतना ही था Part - 9 (Love Story )
Welcome to my story blog!
This is Part 9th of an original Hindi love story, titled:
Bas Itna Hi Tha (बस इतना ही था)
Told in weekly parts, this story explores quiet heartbreak, unspoken love, and the kind of connection that lingers even after it’s gone.
If you’ve ever loved deeply — or lost without closure — I hope this story finds you.
Thank you for reading, and feel free to share your thoughts in the comments.
भाग – 9 “नज़दीकियों की परछाई”
अवंतिका और देव अब एक दूसरे के काफी करीब आ चुके हैं , आइये इस पार्ट में हम उनकी नजदीकियों को और भी करीब से देखते हैं .....
सूरज आसमान में और ऊपर चढ़ चुका था,
पर Dev और Avantika दोनों के भीतर रात की अधूरी बातें अब भी गूँज रही थीं।
Avantika कॉलेज जाने की तैयारी कर रही थी।
आईने में मेकअप की जगह वह बस अपनी आँखों की थकान छुपाने की कोशिश कर रही थी।
उसके मन में हर बार वही सवाल उभर रहा था —
“क्या आज Dev मुझसे कुछ पूछेगा?
या मैं ही खुद को शब्दों से रोक पाऊँगी?”
उधर Dev छत से नीचे उतरा।
डायरी उसके हाथ में थी, और चेहरे पर एक अजीब-सी दृढ़ता।
आज पहली बार उसे लग रहा था कि शायद इंतज़ार और ख़ामोशी दोनों ही अपनी सीमा तक पहुँच चुके हैं।
“शायद अब मुझे उससे एक कदम और आगे बढ़ना होगा…
वरना ये कहानी हमेशा चुप्पियों में ही दबकर रह जाएगी।”
कॉलेज का गेट, भीड़-भाड़, और वही रोज़मर्रा की हलचल —
पर इस बार हवा में कुछ बदला-बदला-सा था।
दोनों के दिलों में यह सुबह सिर्फ़ एक दिन की शुरुआत नहीं थी,
बल्कि किसी नए अध्याय की प्रस्तावना थी।
“दूरी की आवाज़”
सुबह की प्रार्थना के बाद
Avantika अपने कमरे की खिड़की पर बैठ गई।
नीचे पहाड़ों की ढलान पर हल्की धुंध थी,
सूरज की किरणें देवदार के पेड़ों को छू रही थीं।
उसने मोबाइल उठाया,
Dev का चैट खुला…
पर कुछ लिखने से पहले ही
उसकी उंगलियाँ रुक गईं।
उसने खुद से कहा —
“क्या सच में मैं उससे कुछ कहना चाहती हूँ…
या सिर्फ़ उसके पास होने का एहसास चाहिए?”
थोड़ी देर सोचा,
फिर कैमरा खोलकर
खिड़की से बाहर का दृश्य कैद किया —
धूप से भरा पहाड़, चिड़ियों की चहचहाहट,
और आकाश में तैरते बादल।
उसने बिना कोई शब्द लिखे
वो तस्वीर Dev को भेज दी।
उसी समय, मुंबई में…
Dev ट्रेन की खिड़की से शहर की भीड़ को देख रहा था।
शोर, धुआँ, भीड़ —
सब उसके आसपास था,
पर उसका मन कहीं और भटक रहा था।
फोन वाइब्रेट हुआ।
Avantika की भेजी तस्वीर स्क्रीन पर चमकी।
कुछ पल के लिए
मुंबई का सारा शोर जैसे थम गया।
उस तस्वीर को देखते हुए उसे लगा
जैसे वो भी उन पहाड़ों की हवा में साँस ले रहा हो।
उसकी आँखों में चमक आ गई।
उसने तुरंत डायरी खोली और लिखा —
“Avantika…
तुम्हारी खामोशी भी संदेश बन जाती है।
तुम्हारी तस्वीर भी शब्दों से ज़्यादा बोलती है।
शायद तुम्हें कहना नहीं आता,
पर तुम्हारा हर इशारा मुझे सुनाई दे जाता है।”
उसने तस्वीर के जवाब में बस इतना लिखा —
“काश मैं भी वहाँ होता।”
Avantika ने जब ये लाइन पढ़ी,
तो उसकी आँखें ठहर गईं।
दिल की धड़कन अचानक तेज़ हो गई।
वो सोचने लगी —
“मैंने तो सिर्फ़ एक दृश्य भेजा था…
पर क्यों मुझे लगता है कि Dev ने मेरे मन को पढ़ लिया?”
बाहर पक्षियों की आवाज़ गूँज रही थी,
पर उसके कानों में बस वही शब्द बज रहे थे —
“काश मैं भी वहाँ होता।”
और इस तरह,
पहाड़ और समंदर के बीच फैली दूरी
एक तस्वीर और एक वाक्य से
कुछ पल के लिए मिट गई थी।
उस एक तस्वीर और एक वाक्य ने
दोनों की चुप्पियों में नया अर्थ भर दिया था।
Avantika ने मोबाइल स्क्रीन को धीरे से छू लिया,
जैसे Dev की उपस्थिति को महसूस कर रही हो।
उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई,
पर दिल की गहराई में वही पुराना डर फिर से सिर उठाने लगा —
“अगर ये सपना टूट गया तो…?”
उधर Dev ट्रेन की खिड़की से बाहर देख रहा था।
भीड़ फिर से बढ़ चुकी थी,
पर उसके भीतर एक अजीब-सी शांति थी।
जैसे Avantika की भेजी तस्वीर ने
उसके दिन को किसी दुआ की तरह पवित्र बना दिया हो।
उसने मन ही मन सोचा —
“कभी शब्दों की ज़रूरत ही क्यों होती है…
जब एक तस्वीर, एक खामोशी
हज़ारों भावनाएँ कह देती है।”
उसकी उंगलियाँ दोबारा मोबाइल पर गईं,
कुछ लिखने का मन हुआ,
पर उसने खुद को रोक लिया।
वो जानता था कि इस कहानी को जल्दबाज़ी नहीं,
बस समय चाहिए।
दोनों के बीच अब भी दूरी थी —
एक ओर पहाड़ों की शांति,
दूसरी ओर समंदर का शोर।
पर उस दिन दोनों ने महसूस किया
कि असली संवाद शायद शब्दों से नहीं,
बल्कि उन खामोशियों से होता है
जो दिल से दिल तक पहुँचती हैं।
और यहीं से उनकी कहानी
एक नए मोड़ की ओर बढ़ रही थी…
उस दिन के बाद से
Dev और Avantika के बीच शब्दों से ज़्यादा तस्वीरें और खामोशियाँ चलने लगीं।
कभी पहाड़ों का दृश्य, कभी मुंबई की बारिश,
कभी किसी मंदिर की घंटी की आवाज़,
तो कभी किसी भीड़ में से उठी छोटी-सी मुस्कान।
दोनों जानते थे कि ये सब सिर्फ़ इशारे हैं,
पर शायद वही इशारे उनके दिलों के बीच
एक अदृश्य पुल बना रहे थे।
चैट का नया मोड़
एक शाम Dev ने अचानक चैट पर लिखा —
Dev: "Avantika, एक बात पूछूँ?"
Avantika: "हाँ, पूछो।"
Dev: "तुम्हारा role model कौन है?"
थोड़ी देर तक टाइपिंग डॉट्स झिलमिलाते रहे।
फिर Avantika ने लिखा —
Avantika:
"स्वामी विवेकानंद।
क्योंकि उन्होंने सिखाया कि इंसान का असली धर्म है — खुद को पहचानना।
उनकी बातों से मुझे हमेशा ये ताक़त मिलती है
कि चाहे हालात जैसे भी हों,
अंदर का विश्वास कभी टूटना नहीं चाहिए।"
Dev उस जवाब को पढ़कर देर तक स्क्रीन देखता रहा।
फिर उसने धीरे से डायरी खोली और लिखा —
“शायद इसी वजह से
Avantika की आँखों में हमेशा एक अजीब-सी गहराई होती है।
वो सिर्फ़ शब्दों से नहीं,
अपने विश्वास से भी दूसरों को ताक़त देती है।
और शायद यही बात उसे सबसे अलग बनाती है”
Dev ने चैट पर बस इतना लिखा —
Dev: "अब समझा कि तुम्हारे शब्दों में इतनी ताक़त क्यों होती है।"
Avantika ने तुरंत जवाब नहीं दिया,
पर कुछ देर बाद उसने वही सवाल लौटा दिया —
Avantika: "और तुम्हारा role model?"
Dev ने बिना ज़्यादा सोचे टाइप किया —
Dev:
"कान्हा।
क्योंकि वो सिर्फ़ एक देवता नहीं,
बल्कि जीवन जीने की कला हैं।
कभी बांसुरी बजाने वाले, कभी रणभूमि में मार्गदर्शक।
उन्होंने सिखाया कि
मुस्कान के पीछे भी गहरी बुद्धि छिपी हो सकती है…
और प्रेम का मतलब है —
बंधन नहीं, बल्कि आज़ादी देना।"
Avantika ने स्क्रीन पर वह जवाब पढ़ा
और उसकी आँखें ठहर गईं।
वो सोचने लगी —
“शायद इसी वजह से Dev की बातें
कभी शरारती लगती हैं,
तो कभी बहुत गहरी।”
उसके चेहरे पर अनजानी-सी चमक आ गई।
उसने धीरे से फुसफुसाया —
"कान्हा और विवेकानंद…
क्या सच में दो रास्ते कभी एक मंज़िल तक ले जा सकते हैं?"
अगला मोड़
इसी बीच, कॉलेज का नया सत्र शुरू होने वाला था।
नए चेहरे, नई क्लासें…
और शायद Dev और Avantika की कहानी के लिए
एक नया मोड़ भी।
कॉलेज का नया सत्र शुरू हो चुका था।
मुंबई में, Dev भीड़-भाड़ वाली लोकल ट्रेन से उतरकर
अपने कॉलेज के गेट तक पहुँचा।
हाथ में वही पुरानी डायरी थी,
जिसके कोने पर कान्हा की बांसुरी बनी हुई थी।
वो मन ही मन मुस्कुराया —
"कान्हा, अब इस भीड़ में भी रास्ता दिखाना।"
उधर, उत्तराखंड की पहाड़ियों में Avantika
अपने छोटे-से कॉलेज की क्लासरूम में बैठी थी।
उसकी मेज़ पर रखी किताब के कवर पर
स्वामी विवेकानंद की तस्वीर छपी थी।
उसने सोचा —
"नया सत्र, नई क्लासें…
पर असली परीक्षा तो भीतर की होती है।"
शाम को दोनों की चैट फिर शुरू हुई।
Dev: "आज पहला दिन कैसा रहा तुम्हारा?"
Avantika: "ठीक था… बस थोड़ा नया-नया सा लगा। तुम्हारा?"
Dev: "मेरे आसपास बहुत भीड़ थी, पर सच कहूँ तो
मन कहीं और ही था।"
Avantika: "कहाँ?"
Dev: "जहाँ पहाड़ों की हवा मिलती है।"
Avantika ने स्क्रीन देखते ही मुस्कुराकर खिड़की से बाहर देखा।
देवदार के बीच से आती ठंडी हवा सचमुच Dev तक पहुँच रही हो,
उसे ऐसा ही लगा।
कुछ देर चुप्पी रही,
फिर Dev ने लिखा —
Dev: "पता है, आज क्लास में मेरी डायरी देखकर किसी ने कहा —
‘ये तो मंदिर जैसी लगती है।’"
Avantika ने जवाब दिया —
Avantika: "और मेरी किताब देखकर किसी ने कहा —
‘ये तो भाषण जैसी लगती है।’"
दोनों के बीच हंसी के इमोजी तैर गए।
पर उस हंसी के पीछे एक अजीब-सी निकटता थी —
जैसे उनके role models (कान्हा और विवेकानंद)
कहीं अदृश्य पुल की तरह उन्हें जोड़ रहे हों।
उस रात Dev ने डायरी में लिखा —
“वो पहाड़ों पर बैठी है,
मैं समंदर के किनारे…
पर शायद हमारी राहें
अब एक-दूसरे के role models से होकर गुजर रही हैं।”
अगले पार्ट में हम देखेंगे की अवंतिका और देव की जिंदगी किस ओर मोड़ लेती है?????
[जारी है…]
Stay tuned for Part 10 of "Bas Itna Hi Tha" —
जल्द आ रहा है… एक और शाम, एक और सच्चाई।
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