बस इतना ही था Part - 7 (Love Story )

 Welcome to my story blog!

This is Part Seven of an original Hindi love story, titled:

Bas Itna Hi Tha (बस इतना ही था)

Told in weekly parts, this story explores quiet heartbreak, unspoken love, and the kind of connection that lingers even after it’s gone.

If you’ve ever loved deeply — or lost without closure — I hope this story finds you.

Thank you for reading, and feel free to share your thoughts in the comments.

भाग – 7  "कुछ रिश्ते... सिर्फ महसूस किए जाते हैं, कहे नहीं जाते… "

जैसा की लास्ट पार्ट में हमने देखा की अब देव और अवंतिका के बीच दूरिया काफी कम हो रही है, इस पार्ट में हम  देखते हैं की क्या देव अपने दिल की बात अवंतिका को बोल पायेगा या नहीं ???

                            

Dev अब धीरे-धीरे खुद से लड़ने लगा था।
उसका मन कहता —

"अब तो कह दे... वो तुझे समझती है।
शायद वो भी तुझसे कुछ कहना चाहती हो।"


 

पर हर बार जब वो थोड़ा झुकता उस तरफ़,
Avantika की नज़रें उसकी चुप्पी को पढ़ लेतीं... और बात वहीं से मोड़ देती।


एक दिन रात को, देर तक बात चल रही थी।
बातें ज़िंदगी की थीं, मंज़िलों की थीं, और थोड़ी-सी अधूरी-सी ख्वाहिशों की भी।

Dev ने हल्के से टाइप किया:

“तुम जानती हो ना, कुछ लोग ज़िंदगी में इतने खास हो जाते हैं…
कि उनके बिना सब अधूरा लगता है?”

Avantika ने जवाब दिया:

“हम्म…
पर कुछ लोग खास रहकर भी सिर्फ सफ़र का हिस्सा बनते हैं…
मंज़िल नहीं।”


 

Dev कुछ पल तक स्क्रीन देखता रहा।
वो समझ गया था…
Avantika ने शायद सब जान लिया है — लेकिन वो खुद नहीं चाहती कि Dev आगे बढ़े।


Dev ने थोड़ी हिम्मत कर के फिर लिखा:

“कभी लगा है तुम्हें… कि कोई तुम्हारी हर बात, हर खामोशी तक को समझता है?”
“कोई ऐसा, जिसे तुमने कभी छुआ भी नहीं, लेकिन वो सबसे करीब लगता है?”


 

Avantika ने typing शुरू की…
फिर कुछ देर typing रुकी…



और फिर आई बस ये लाइन:

“लोग जब बहुत करीब आ जाते हैं…
तो डर लगता है…
कि कहीं हम उन्हें खो न दें।”

Dev समझ गया —
ये कोई इनकार नहीं था,
लेकिन ये इज़हार भी नहीं था।


Avantika… उसकी भावनाओं की कद्र करती थी।
लेकिन वो कभी नहीं चाहती थी कि Dev उससे उम्मीद बाँध ले।
उसे लगता था —

"Dev बहुत कोमल है…
अगर उसने मुझे चाह लिया… और मैं उसे नहीं दे पाई वो साथ,
तो उसका दिल टूटेगा…"

इसलिए वो हर बार जब Dev इशारे से भी कुछ कहता,
Avantika बड़ी ही सजग समझदारी से बात को मोड़ देती —

“चलो छोड़ो... आज तो तुम कविता सुनाओ अपनी।”
“वैसे भी तुम जब भावुक होते हो, तब सबसे सुंदर लिखते हो…”
“मैं आज भी उस पुरानी कविता को नहीं भूली…” 

और Dev?
वो जानता था कि Avantika ने फिर बात मोड़ दी है,
लेकिन वो भी उसकी सीमाओं की इज़्ज़त करता था।




थोड़ी देर चुप्पी के बाद Dev ने अचानक टाइप किया:

“ये मन को कैसे हम काबू में कर सकते हैं, Avantika?
कभी लगता है जैसे ये दिल अपनी ही जिद पर अड़ा रहता है।”


 

Avantika कुछ देर चुप रही… फिर उसका जवाब आया:

“मन को जीतना आसान नहीं होता, Dev।
ये तो एक बच्चा है… जितना तुम इसे बाँधोगे, उतना रोएगा।
पर अगर तुम इसे प्यार से समझाओ, तो धीरे-धीरे मान भी जाएगा।”


 

Dev ने फिर लिखा:

“पर जब ये दिल किसी को चाहने लगे, तब कैसे समझाएँ इसे?"

Avantika ने हल्की-सी मुस्कान के साथ टाइप किया:

“तुम्हें पता है?
मन को वश में करना मतलब उसे मार देना नहीं है…
बल्कि उसकी हर चाहत को इतनी रोशनी में देखना है,
कि समझ आ जाए — कौन-सी चाहत सच्ची है और कौन सिर्फ़ मोह।”


थोड़ी देर बाद उसने एक और लाइन भेजी:

“जैसे मैं तुम्हें सुनती हूँ…
तुम्हारे हर शब्द के पीछे की चुप्पी तक को समझने की कोशिश करती हूँ।
कभी-कभी समझना ही काफी होता है… पाना ज़रूरी नहीं।”


 Dev स्क्रीन को देखता रह गया…

Avantika की बातें किसी संत की तरह निर्मल थीं,
पर उनमें छुपी नरमी और हल्की-सी रोमानी गहराई
उसके दिल को और भी गहराई तक छू गई।

                         

कुछ देर बाद Dev ने एक और सवाल टाइप किया:

“Avantika…
क्या किसी को दिल से चाहना ग़लत है?”


कुछ पल तक टाइपिंग डॉट्स चलते रहे।

फिर Avantika ने जवाब दिया:

“नहीं Dev, चाहना कभी ग़लत नहीं होता…
गलत तब होता है, जब चाहत उम्मीद में बदल जाए।
क्योंकि उम्मीदें हमें बाँधती हैं… और चाहत हमें आज़ाद करती है।
सच्चा प्यार वो है, जिसमें पाने की ज़िद न हो,
बस समझने और संजोने की ख्वाहिश हो।”


Dev की आँखें स्क्रीन पर ठहर गईं।
Avantika के हर शब्द में एक अद्भुत शांति थी —
मानो उसने उसके दिल के सबसे उलझे हुए धागे को
बहुत नर्म हाथों से सुलझा दिया हो।


Dev ने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ एक और सवाल भेजा:

“Kya tumne kabhi kisi se sachcha pyaar nahi kiya hai, Avantika?”


इस बार टाइपिंग डॉट्स बहुत देर तक चलते रहे…
फिर Avantika ने लिखा:

“सच कहूँ Dev…
हाँ, मैंने किया है।
पर मेरा पहला और सबसे गहरा प्यार हमेशा शिव से रहा है।
जब मैं उनकी मूर्ति के सामने बैठती हूँ,
तो लगता है जैसे सारी दुनिया थम जाती है।
वो मौन मुझे सब कह देता है,
जो कोई इंसान शायद कभी कह भी न पाए।”


उसने अगली पंक्तियाँ टाइप कीं:

“लोग कहते हैं प्यार मिलने से पूरा होता है,
पर मैंने तो जाना है —
सच्चा प्यार अर्पण करने से पूरा होता है।
शिव के सामने बैठकर लगता है,
मैं खुद को खोकर भी मिल जाती हूँ।”

कुछ पल ठहरकर उसने हल्के-से रोमानी अंदाज़ में जोड़ा:

“शायद इसी वजह से जब तुमसे बातें करती हूँ,
तो मुझे वही शांति मिलती है।
जैसे कोई प्रार्थना…
जिसमें शब्द कम हों, एहसास ज़्यादा।”

 

Dev स्क्रीन पर टकटकी लगाए बैठा रहा।
Avantika की बातें उसके दिल को किसी प्रार्थना की तरह छू गईं।
उसने पहली बार जाना —
कि Avantika का प्यार कितना निर्मल,
कितना आध्यात्मिक… और कितना अनोखा है।




उस रात Dev ने अपनी डायरी में लिखा:

“तुम्हारे शब्द मुझे रोक लेते हैं,
और मेरी चुप्पियाँ तुम्हें समझ जाती हैं…
शायद यही रिश्ता है हमारा —
जैसे दो तारे,
जो कभी टकराते नहीं,
लेकिन एक-दूसरे की रोशनी में चमकते हैं।”

“कुछ सवाल ऐसे होते हैं,
जिनका जवाब हमें खुद से भी नहीं मिलता…
बस दिल हर रोज़ वही पंक्ति दोहराता है —
क्या अधूरी मोहब्बत भी मुकम्मल हो सकती है?”

“कभी लगता है, तुम मेरे बहुत करीब हो —
इतने करीब कि मेरी साँसें भी
तुम्हारे नाम का सुर बन जाती हैं।
फिर अचानक ख्याल आता है —
ये नज़दीकियाँ भी शायद
सिर्फ़ सफ़र की हैं, मंज़िल की नहीं।”

“मैं सोचता हूँ…
क्या तुम्हें भी कभी डर नहीं लगता?
डर कि कहीं मैं तुम्हें इतना न चाह लूँ,
कि तुम्हारे जाने पर मेरा पूरा वजूद
रेत की तरह बिखर जाए…”

“पर शायद यही सच है हमारा रिश्ता —
तुम्हारा डर और मेरी खामोशी।
एक-दूसरे को समझकर भी
नाम न दे पाने की मजबूरी।
जैसे अधूरी प्रार्थना…
जो मौन रहकर भी
ईश्वर तक पहुँच जाती है।”

                              


उसी रात Avantika ने भी अपनी डायरी/प्रार्थना में लिखा:

“कभी-कभी सोचती हूँ…
क्यों उसकी आँखों में इतनी मासूमियत है,
कि मैं चाहकर भी उसे आहट नहीं बनने देती अपने दिल की।

Dev के शब्द मेरे भीतर ऐसे उतरते हैं,
जैसे शिव के मंदिर में बजती घंटियाँ —
शोर नहीं करतीं,
बस मौन को और गहरा बना देती हैं।

मैं जानती हूँ…
वो मुझे चाहता है।
पर मैं?
शायद मैं भी उसके शब्दों में
एक अजीब-सी शांति खोजने लगी हूँ।

डरती हूँ…
कहीं उसकी मासूम चाहत मेरी अधूरी ख्वाहिश न बन जाए।
और फिर, मैं वही औरत बनकर न रह जाऊँ,
जो किसी की कहानी में सिर्फ़ एक अधूरा किरदार है।

मैंने शिव से प्रार्थना की है…
कि उसे कभी अकेलापन न मिले।
अगर मेरी खामोशी ही उसकी ताक़त है,
तो मैं हमेशा खामोश रहूँगी।
क्योंकि कुछ रिश्ते…
सिर्फ़ महसूस किए जाते हैं, कहे नहीं जाते।”





अगले पार्ट में हम देखेंगे की आखिर अवंतिका ने आखिर देव को क्यों ऐसा बोला की वो सिर्फ शिव से प्यार करती है, क्या सच में अवंतिका के दिल में कुछ नहीं है या ये इसके पीछे कोई वजह है???

[जारी है…]

Stay tuned for Part 8 of "Bas Itna Hi Tha" —
जल्द आ रहा है… एक और शाम, एक और सच्चाई।

                                            

❤️ अगर कहानी पसंद आई हो, तो कमेंट ज़रूर करें। आपकी राय मेरे लिए मायने रखती है।

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