बस इतना ही था Part - 10 (Love Story )
Welcome to my story blog!
This is Part 10 th of an original Hindi love story, titled:
Bas Itna Hi Tha (बस इतना ही था)
Told in weekly parts, this story explores quiet heartbreak, unspoken love, and the kind of connection that lingers even after it’s gone.
If you’ve ever loved deeply — or lost without closure — I hope this story finds you.
Thank you for reading, and feel free to share your thoughts in the comments.
भाग – 10 “देव - अवंतिका और चित्रा ”
Avantika के कमरे में किताबें और कॉपियाँ फैली थीं। वह पढ़ाई में डूबी हुई थी और पास ही उसका मोबाइल रखा था।
उसकी छोटी बहन Chhitra हमेशा की तरह इधर-उधर मस्ती करती घूम रही थी।
अचानक उसकी नज़र Avantika के फोन पर पड़ी। स्क्रीन पर Dev का चैट खुला था। होंठों पर शरारती मुस्कान आ गई।
"ज़रा मज़ा लिया जाए… देखूँ ये Dev कितना सीरियस है।"
उसने उँगलियाँ चलाईं—
“Hi Dev… थोड़ा बोर हो रही हूँ। कुछ मज़ेदार बात करो न।”
फोन के उस पार Dev ठिठक गया। Avantika कभी ऐसे casually चैट शुरू नहीं करती थी।
फिर भी उसने हँसकर लिखा—
“ओह! आज तो मूड हल्का करने का इशारा है। बताओ… मज़ाक चाहिए या सीरियस बातें?”
Chhitra ने फिर शरारती अंदाज़ में लिखा—
“Fun चाहिए… थोड़ा flirt भी चलेगा।”
Dev के चेहरे पर हल्की हैरानी आई। मगर उसने कोई शक नहीं किया और मुस्कुराकर टाइप किया—
“मज़ाक अच्छा है,......
यह पढ़ते ही Chhitra के चेहरे की हँसी उड़ गई।
उसने तुरंत चैट delete कर दिया, ताकि Avantika को कुछ पता न चले।
"अगर मैसेज रह जाता तो Avantika को पहली ही बार में समझ आ जाता…"
धीरे-धीरे यह उसकी आदत बन गई।
जब भी मौका मिलता, Avantika के फोन से Dev को मैसेज करती, और हर बार सब कुछ delete कर देती।
Dev को कभी आभास तक नहीं हुआ।
उसे लगता रहा कि वो Avantika से ही बात कर रहा है, बस कभी-कभी उसके मूड अलग होते हैं।
लेकिन Chhitra के दिल में अब शरारत से आगे कुछ और जन्म लेने लगा—
ईर्ष्या और चाहत।
वह सोचती—
“Dev हमेशा Avantika को ही क्यों चुनता है? उसमें ऐसा क्या है जो मुझमें नहीं?”
कई बार उसने उलझे हुए सवाल लिखे—
“अगर मैं अचानक तुम्हारी ज़िंदगी से चली जाऊँ तो?”
Dev ने पल भर ठहरकर जवाब दिया—
“तो मेरी ज़िंदगी से रंग चला जाएगा। लेकिन मैं तब भी तुम्हें अपनी दुआओं में याद रखूँगा।”
ये पढ़कर Chhitra की आँखें भर आईं।
Dev के हर शब्द में Avantika ही बसी थी।
उधर Avantika को धीरे-धीरे कुछ अजीब लगने लगा।
कभी चैट का लहजा बदल जाता, कभी मैसेज खुद-ब-खुद गायब हो जाते।
उसे लगता—
“शायद Dev खुद delete कर देता होगा।”
लेकिन उसके मन के भीतर शक की परतें जमने लगीं।
एक दिन उसने देखा—
Chhitra उसके फोन के पास बैठी है।
जैसे ही Avantika कमरे में दाख़िल हुई, Chhitra ने झट से स्क्रीन बंद कर दी।
उस पल Avantika का दिल धड़क उठा।
उसके दिमाग़ में सब जोड़ने पर तस्वीर साफ़ हो गई—
अजीब चैट्स, delete हुए मैसेज, और अब Chhitra का बर्ताव।
“तो ये सब Dev नहीं… मेरी अपनी बहन कर रही थी।”
सच्चाई का एहसास होते ही Avantika के भीतर तूफ़ान उठ खड़ा हुआ।
उसने खिड़की के पास जाकर आसमान की ओर देखा।
चाँद चमक रहा था, मगर उसके दिल में अँधेरा उतर आया।
उसका मन बार-बार कहता—
Dev को सब सच बता दे।
लेकिन अगला ही पल सोचती—
“अगर Dev को पता चला कि मैं नहीं, बल्कि Chhitra उससे बातें कर रही थी, तो उसका भरोसा हमेशा के लिए टूट जाएगा।
वो भी टूट जाएगा… और मैं भी।”
आख़िर उसने ठान लिया— अब Dev से चैट नहीं करेगी।
उसने फोन एक ओर रख दिया।
पहाड़ों की ठंडी हवा उसके चेहरे को छूकर गुज़री, मगर भीतर जो खालीपन उतर चुका था, वह और गहरा गया।
Dev वहीं, मुंबई की भीड़ में बैठा, मासूमियत से अब भी मान रहा था कि वो Avantika से ही बातें कर रहा है—
उसी Avantika से, जो उसके दिल के सबसे पवित्र कोने में बसी थी।
लेकिन Avantika जान चुकी थी कि सच्चाई अब दोनों के बीच एक ऐसी दूरी बन चुकी है, जो शायद कभी मिट नहीं सकती।
कई दिनों की चुप्पी के बाद अचानक Dev के फोन पर एक नोटिफ़िकेशन चमका।
Avantika: “Hi Dev…”
उसका दिल धड़क उठा।
मुंबई की भीड़भाड़ से भरी ट्रेन में बैठा Dev एकदम चुप हो गया।
स्क्रीन को बार-बार देखता रहा, मानो उसकी आँखों पर भरोसा ही न हो रहा हो।
उसके चेहरे पर अनायास मुस्कान फैल गई।
"आख़िरकार… उसने फिर से बात की।"
दिल में जैसे किसी ने दीया जला दिया हो।
Dev ने हड़बड़ी में लिखा—
“Avantika… तुम? यकीन ही नहीं हो रहा। कितना मिस किया है तुम्हें!”
Avantika ने टाइपिंग शुरू की, फिर मिटा दी।
थोड़ी देर तक फोन स्क्रीन को देखती रही।
आख़िरकार उसने सिर्फ़ इतना लिखा—
“बस सोचा थोड़ा हालचाल पूछ लूँ।”
Dev के भीतर अचानक पुरानी धड़कनें लौट आईं।
उसकी आँखों में चमक थी।
“तुम नहीं जानती, तुम्हारे एक मैसेज से मेरी कितनी रातें रोशन हो जाती हैं।”
Avantika यह पढ़कर ठहर गई।
उसके दिल में अजीब-सी बेचैनी उठी।
"ये वही Dev है… वही सच्चाई, वही मासूमियत।
लेकिन मैं नहीं चाहती कि ये मुझे अपनी ज़िंदगी की आदत बना ले।"
कुछ देर सोचने के बाद उसने लिखा—
“Dev… मैं चाहती हूँ कि हमारी बातें सिर्फ़ खुशी तक सीमित रहें।
आदत मत बना लेना मुझे।
क्योंकि आदतें जब छूटती हैं… तो बहुत दर्द देती हैं।”
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
ये लाइन लिखना उसके लिए आसान नहीं था।
पर उसने खुद को सख्त बनाया।
फोन के उस पार Dev ठहर गया।
उसके होंठों की मुस्कान धीरे-धीरे गम्भीरता में बदल गई।
ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए उसने एक गहरी साँस ली।
फिर उसने धीरे से लिखा—
“तुम मेरी आदत नहीं हो Avantika…
तुम मेरी दुआ हो।
आदतें टूट जाती हैं, दुआएँ नहीं।”
Avantika के होंठ काँप उठे।
उसके भीतर एक साथ डर और कोमलता दोनों उमड़ पड़े।
फोन हाथ में लिए वो चुप बैठी रही।
"क्या सचमुच मैं उसकी दुआ बन चुकी हूँ?
या फिर मैं ही उसके लिए एक नशा हूँ, जिसे मुझे तोड़ना पड़ेगा?"
उसकी आँखों में हल्की नमी तैर आई।
उसने स्क्रीन लॉक कर दी और खिड़की से बाहर झाँकने लगी।
बाहर पहाड़ों पर सूरज ढल रहा था,
पर उसके भीतर का सूरज डूबने और उगने की लड़ाई लड़ रहा था।
जैसा की अब अवंतिका ने सोच लिया है की अब वो देव से बात नहीं करेगी, क्या अब ये कहानी यही ख़तम हो जाएगी या कुछ ऐसा होगा की इनकी जिंदगी को एकदम बदल देगी??
[जारी है…]
Stay tuned for Part 11 of "Bas Itna Hi Tha" —
जल्द आ रहा है… एक और शाम, एक और सच्चाई।
❤️ अगर कहानी पसंद आई हो, तो कमेंट ज़रूर करें। आपकी राय मेरे लिए मायने रखती है।
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