Unspoken Bond Part 8 : Climax
Welcome to my story blog!
This is Part 8 of an original Hindi story, titled:
Unspoken Bond
Told in weekly parts, this story explores quiet heartbreak, unspoken love, and the kind of connection that lingers even after it’s gone.
If you’ve ever loved deeply — or lost without closure — I hope this story finds you.
Thank you for reading. Feel free to share your thoughts in the comments.
💔 Part 8 – छिपा हुआ दर्द (Hidden Pain)
रात का सन्नाटा लाइब्रेरी में पसरा हुआ था।
टेबल पर खुली किताबें, अधूरे नोट्स, और उनके बीच बैठा था दिलशान —
ख़ामोश, पर मन में कई सवाल लिए हुए।
तभी लता आई।
आज उसके चेहरे पर वो पुरानी शरारत नहीं थी…
बल्कि एक अजीब-सी घबराहट थी।
दिलशान (फिक्रमंद होकर):
“लता… आज तू कुछ ज़्यादा ही शांत है। सब ठीक है ना?”
लता (हल्की मुस्कान के साथ, पर आँखों में थकावट):
“हाँ… बस थोड़ा सिर दर्द है। कुछ ख़ास नहीं।”
दिलशान ने गौर से देखा —
उसकी आँखों की चमक कहीं खो गई थी।
वो धीरे से बोला,
दिलशान:
“मुझसे कुछ छुपा मत, लता। मैं तेरे लिए हूँ।”
कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
फिर लता ने गहरी साँस ली… और धीरे से कहा —
लता (काँपती आवाज़ में):
“दिलशान… मुझे एक बीमारी है।
डॉक्टरों ने कहा है… मेरे पास बस कुछ हफ़्ते बचे हैं।
इसलिए मैं हर पल जी लेती हूँ…
हँसी, मज़ाक और philosophy में।”
दिलशान का दिल जैसे रुक गया।
उसके हाथ काँपने लगे, आँखें नम हो गईं।
दिलशान (टूटी आवाज़ में):
“तूने… पहले क्यों नहीं बताया, लता?”
लता (धीरे-धीरे मुस्कुराते हुए):
“क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरी कमजोरी तेरे हौसले को कम कर दे।
मैं चाहती थी कि तू मुझे वैसे ही देखे —
हँसती, बोलती, ज़िंदा…
ना कि किसी बीमारी से जूझती लड़की की तरह।”
दिलशान ने उसके हाथ थाम लिए —
जैसे कह रहा हो, “अब तू कहीं नहीं जाएगी।”
दिलशान:
“अब मैं हर पल तेरे साथ रहूँगा, लता।
तेरी मुस्कान मेरी ज़िम्मेदारी है।”
लता ने उसकी आँखों में देखा —
और पहली बार, बिना बोले “धन्यवाद” कह दिया।
रात की ठंडी हवा बह रही थी।
चाँदनी में दोनों छत पर खड़े थे —
एक चुप्पी, जो हज़ार बातों से ज़्यादा कह रही थी।
लता आसमान की तरफ़ देख रही थी,
जैसे तारों से कुछ कह रही हो।
दिलशान (मन ही मन):
“यही है लता —
जो हर हँसी के पीछे अपना दर्द छुपा लेती है।
मैं इसे खोना नहीं चाहता।”
लता (धीरे से):
“अब तू समझ गया होगा…
मेरी हँसी कोई मज़ाक नहीं थी।
वो मेरी ताक़त थी… और तू, मेरा गवाह।”
दिलशान (आँखों में आँसू लिए):
“मैं हमेशा तेरा गवाह रहूँगा, लता।
हर हँसी में, हर आँसू में… हर साँस में।”
अब दिलशान ने समझ लिया था —
लता की मुस्कान के पीछे छिपा दर्द कितना गहरा था।
उसकी ज़िंदगी सीमित थी,
पर उसकी आत्मा असीम थी।
अब कहानी वहाँ पहुँच गई है —
जहाँ “समय” कम है,
पर “भावना” असीम है…
जहाँ हर लम्हा, एक याद बनने वाला है।
👉[जारी है…]
Stay tuned for Part 9 of "Unspoken Bond" —
जल्द आ रहा है… एक और शाम, एक और सच्चाई।
❤️ अगर कहानी पसंद आई हो, तो कमेंट ज़रूर करें। आपकी राय मेरे लिए मायने रखती है।
Comments
Post a Comment